मंगलवार, 20 मार्च 2018

चकिया के केदार ----


                    





                                         चकिया के केदार’


ऐसा लगता है कि यहाँ मास्को में खाना पकाने के लिए आग नहीं जलाई जाती, क्योंकि यहाँ मुझे अपने घरों के दीवारों पर उपले पाथने वाली औरतें दिखाई नहीं देती, घरों की छतों पर अबूतालिब की बड़ी टोपी जैसा धुआं नहीं दिखाई देता | छत को समतल करने के लिए रोलर भी नहीं नजर आते | मास्को वासी अपनी छतों पर घास सुखाते हों, ऐसा भी नहीं लगता | पर यदि वे घास नहीं सुखाते तो अपनी गायों को क्या खिलाते हैं ? सूखी टहनियों या घास का गट्ठा उठाये एक भी औरत कहीं नजर नहीं आयी | न तो कभी जुरने की झनक और न खंजड़ी की ढमक ही सुनाई दी | ऐसा लगता है कि जवान लोग यहाँ शादियाँ ही नहीं करते और ब्याह का धूम-धड़ाका ही नहीं होता | इस अजीब शहर की गलियों सड़कों पर मैंने कितने भी चक्कर क्यों न लगाए, कभी एक बार भी कोई भेड़ नजर नहीं आयी | तो सवाल पैदा होता है कि जब कोई मेहमान आता है तो मास्को वाले क्या जिबह करते हैं ? अगर भेड़ को जिबह करके नहीं, तो यार दोस्त के आने पर कैसे उसकी खातिरदारी करते हैं ? नहीं, ऐसी जिंदगी मुझे नहीं चाहिए | मैं तो अपने ‘त्सादा’ गाँव में ही रहना चाहता हूँ, जहाँ बीबी से यह कहकर कि वह कुछ ज्यादा लहसुन डालकर खीनकाल बनाए, उन्हें जी भरकर खाया जा सकता है ..... |
                              ......................  ( मेरा दागिस्तान – रसूल हमजातोव )


यह उस ख़त का अंश है जो ‘रसूल हमजातोव’ के पिता ने पहली बार मास्को जाने पर अपने बेटे ‘रसूल’ को लिखा था | जाहिर है कि इस ख़त लहजा काफी मजाकिया था | लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि रसूल के पिता ने बड़े शहर मास्को के मुकाबले अपने जन्म-गाँव ‘त्सादा’ को तरजीह दी थी | वे अपने ‘त्सादा’ को प्यार करते थे और उसके मुकाबले में दुनिया की सभी राजधानियों को ठुकरा सकते थे | यह दृष्टान्त सिर्फ ‘त्सादा’ के ‘हमजात’ के लिए ही नहीं है, वरन दुनिया के सभी बड़े और महान लेखकों के बारे में दिया जा सकता है | हम जो सामान्यतया उनके लेखन के बड़ेपन को तो देखते हैं, लेकिन उनकी जड़ों को नजरअंदाज कर देते हैं | उन जड़ों को, जहाँ से उन्हें खाद-पानी मिलता है, जहाँ से उनका लेखन पूरी दुनिया में छितराता है | आप दुनिया के किसी भी महान लेखक को देखिये, वह अपनी जड़ों में गहरा धसा नजर आयेगा | 

हिंदी के वरिष्ठ कवि ‘केदारनाथ सिंह’, जिनका कल निधन हो गया, की जड़ें भी इसी गहराई के साथ अपने गाँव और समाज से जुडी हुई थी | यूं तो उनके बारे में बात करते हुए उनकी सैकड़ों कवितायें हमारा रास्ता रोक लेती हैं, लेकिन हम चाहते हैं कि उनकी कविताओं से अपना मोह हटाकर उनके लिखने वाले मन-मस्तिष्क को पढने का प्रयास करें | इस बात को जानते हुए कि आठ-दस संग्रहों में सैकड़ों कवितायें लिखने वाले किसी कवि के बारे में बिना कविता के बात करना कितना कठिन है | जिनकी कवितायें आज हर साहित्य प्रेमी की जुबान पर हैं, उन्हें किनारे करने का प्रयास कितना दुष्कर है | लेकिन हम समझते हैं कि उनके गाँव-जवारी होने के नाते हमें उनकी जड़ों पर जरुर बात करनी चाहिए |  

‘केदार जी’ की जिन कविताओं पर दुनिया मुग्ध रहती थी, वे कवितायें उनके गाँव और जमीन से जुड़कर ही आकार लेती थी | जिस ‘बिम्ब विधान’ पर आज दुनिया इतराती है और जिसको स्थापित करने का श्रेय ‘केदार जी’ को ही जाता है, वे सारे बिम्ब उसी गाँव-जमीन से पैदा होते रहे | उनके अर्थ चाहें कितने भी वैश्विक क्यों न हों, उनका कथ्य चाहें कितना भी भूमंडलीकृत क्यों न हों, पैदा तो उन्हें उनके गाँव ‘चकिया’ से ही होना था | यह देशज और जमीनी जुड़ाव ही रहा, जिसने उन्हें ‘केदारनाथ सिंह’ बनाया | आप उनके सभी कविता संग्रहों को पढ़ जाईये, हर दूसरी कविता में उनका गाँव-जवार, उसकी भाषा-बोली, उसके लोग, उसके पशु-पक्षी, उसकी फसल-नदी, उसका हाट-बाजार, उसका तालाब-त्यौहार, उसके किसान-कामगार अपने पूरे वजूद के साथ दिखाई देंगे | वे इनमें इस कदर गुथे हुए मिलेंगे कि कोई भी भौतिक या रासायनिक प्रक्रिया उन्हें अलगा नहीं सकती | जैसे कि कविता नहीं, वरन उस देश-गाँव को ही लिखा जा रहा है और हम उसे कविता के तौर पर पढ़ रहे हैं | जैसे कि कोई अपनी कहानी सुना रहा है, और हम उसे जगबीती की तरह से सुन रहे हैं | जैसे कि दुनिया कि तमाम कालजयी ‘आत्मकथाएं’ अपनी गाथा कहते हुए भी दुनिया की गाथा बन जाती हैं | हिंदी कविता में यह दुर्लभ प्रयोग ‘केदार जी’ ने किया |  उनकी कवितायें इस बात का प्रमाण हैं कि देशज बिम्बों से भी कविता का ‘वैश्विक फलक’ तैयार हो सकता है और इन दोनों में कोई विरोधाभास नहीं था |

यह सच है कि जीवन में 83 वसंत देखने वाले ‘केदार जी’ मुश्किल से दो-ढाई दशक तक ही नियमित रूप से अपने गाँव में रहे | और यह भी सच है कि जिस पीढ़ी का वे प्रतिनिधित्व करते थे, उस पीढ़ी में तीन दशक पहले तक अमूमन ही लोगों का गाँव से रिश्ता रहा था | चाहें वहां रहते हुए या चाहें वहां बार-बार आते-जाते हुए | लेकिन केदार जी का जुड़ाव यहीं पर अपनी पीढ़ी में विशिष्ट बनता था कि वे गाँव से रोजी-रोटी की तलाश में शहर तो गए, लेकिन उनका मन गाँव के साथ हमेशा ही बना रहा | वह कभी भी अपनी ‘चकिया’ को छोड़ नहीं पाया | शहर उन्हें बेशक दुनिया जहान के बारे में जानने का अवसर देता रहा, दुनिया के विविध नजारों से समृद्ध करता रहा, उसे समझने में मदद करता रहा | लेकिन उसे व्यक्त करने का तरीका, उसे कह पाने का सलीका गाँव और उसकी जमीन से ही मिला | क्योंकि वे एक दूसरे को सबसे बेहतर तरीके से जानते थे |

विगत पांच दशको से वे अपने शहरी प्रवास के बीच से बार-बार ‘चकिया’ लौटते रहे | वर्ष में तीन-चार बार उसका सानिध्य चाहते रहे तो इसलिए कि वह उन्हें सहज रूप से बुलाता रहा, आकर्षित करता रहा और समृद्ध भी | अस्सी साल से अधिक की इस उम्र में हम उन्हें गर्मी के महीने में बिना बिजली की सुविधा के गाँव में आराम से एक महीने रहते हुए पा सकते थे | जाड़े और बरसात के महीनों में कम से कमतर भौतिक सुविधाओं में प्रसन्नता पूर्वक चौपाल लगाते हुए देख सकते थे | यहाँ उन्हें न तो बिजली की अनुपलब्द्धता से परेशानी होती थी और न तमाम आधुनिक साधनों की गैर-मौजूदगी से |

जिस दौर में लोग-बाग़ त्यौहारों और शादी विवाहों तक में गाँव आने से कतराने लगे हों, उस दौर में ‘केदार जी’ का यह जुड़ाव बहुत कुछ स्वतः ही बयान करता था | यदि यह जुड़ाव बाहर से आरोपित होता तो ऎसी तमाम परिस्थितियां उनके सामने भी थीं, जिनमें वे यहाँ आने से कतरा सकते थे और उसे सही भी ठहरा सकते थे | आज उनका परिवार पूरी तरह से ‘शहराती’ हो चुका है | पहले पत्नी और अब माँ के चले जाने के बाद यहाँ आने पर किसी का साथ भी नहीं होता था | अब उन्हें अकेले आना होता थे और अपने पुराने संयुक्त परिवार के भरोसे उस समय को जीना | घर के तमाम बंटवारे के बीच उन्होंने अपने लिए कुछ नहीं माँगा था | सिवाय इसके कि कोने में थोड़ी बची हुयी जमीन, जिस पर एक छोटा सा कमरा बन सके, जो उनके होने पर गुलजार रहता था |

उत्तर-प्रदेश के धुर पूर्व में स्थित इस पिछड़े जिले बलिया की भौगोलिक स्थिति वैसे ही देश के मानचित्र पर एक लुटे-पिटे और भुक्खड़ समाज के रूप में बनती है | उसमें भी उनका गाँव वहां से 35-40 किलोमीटर दूर एक ऐसे दोआब में स्थित है, जहाँ एक तरफ से घाघरा का तांडव है तो दूसरी तरफ से गंगा का | यहाँ जाने के लिए मुख्य सड़क आपको बैरिया छोड़ देती है, जहाँ से तीन किलोमीटर उत्तर की तरफ रानीगंज बाजार आता है | जबकि ट्रेन से पहुँचने के लिए आपको सुरेमनपुर स्टेशन पर उतरना होता है, जहाँ से तीन किलोमीटर दक्षिण की तरफ रानीगंज बाजार है | इसी रानीगंज बाजार से केदार जी के गाँव ‘चकिया’ के लिए रास्ता मुड़ता है | लगभग दो-तीन किलोमीटर लम्बे इस रास्ते पर पिच तो डाल दी गयी है, लेकिन वह उतनी ही चिकनी है, जितनी कि पूर्वांचल के गाँवों की सड़कें सामान्यतया हुआ करती हैं | पिच पर चलते हुए आप सामने देखने का जोखिम नहीं उठा सकते | हर समय आपको सड़क पर ही निगाह जमाये रखनी पड़ती है, क्योंकि हर अगले उठे हुए कदम के लिए गड्ढा इन्तजार कर रहा होता है | यदि आप अपने साधन से नहीं हैं तो जिला मुख्यालय ‘बलिया’ से 35-40 किलोमीटर दूर इस गाँव तक पहुँचने दो से तीन घंटे तक का समय लग सकता है |

इसी रास्ते से होते हुए पहली बार जब हम ‘रानीगंज बाजार’ से ‘चकिया’ के लिए मुड़े थे, तो हमारी मुलाक़ात उस मोड़ पर अशोक ‘पान-वाले’ से हुई थी | हमने उनसे केदार जी के बारे में जानना चाहा था | ‘अरे हां ....आप कवि जी की बात कर रहे हैं न | वे जब भी गाँव आते हैं, शाम को यहाँ जरुर आते हैं |’ हम आगे बढ़े थे | उनका गाँव अभी ढाई किलोमीटर दूर था | चार-पांच युवक आते हुए दिखाई दिए | मन में जिज्ञासा उठी कि आज के लड़के ‘केदार जी’ के बारे में क्या सोचते हैं, जरा इसकी थाह ली जाय | दो लड़के उनके बारे में पूछे गये सवाल पर चुप रहे | लेकिन बाकी के तीन लड़के उनके गाँव लगातार आने, युवाओं से मिलने, बात करने और सलाह देने की बात को सहर्ष बयान करने लगे | उनके दरवाजे पर जाने वाला रास्ता बेहद संकरी गलियों से होकर गुजरता था, जहाँ ‘केदार जी’ गाँव के अपने ठेठ देहाती मित्रों के बीच बैठे हुए मिलते |

एक बार हम मई के महीने में उनके गाँव पहुंचे थे | बिजली की स्थिति अप्रैल से ही उत्तर-प्रदेश के गाँवों के लिए ‘गूलर की फूल’ बनी हुयी थी | वे हमारी अगवानी में बाहर उठकर आये | गाँव तक पहुँचने में हुयी असुविधा के लिए खेद व्यक्त किया | फिर अपने कमरे से पेड़ा ले आये | यदि आप उन्हें नहीं जानते थे कि यह व्यक्ति हिंदी ही नहीं वरन दुनिया के शीर्षस्थ कवियों में से एक है, तो उनके बातचीत के तौर-तरीके को देखकर उन्हें चकिया के किसी आम गँवई-देहाती से अलगा पाना असंभव था | अंग्रेजी तो भूल ही जाइए, उनकी बातचीत में हिंदी तक का कोई एक शब्द भी मुश्किल से ही आता था | उनके साथ पूरी बातचीत ‘भोजपुरी’ में चलती थी |

केदार जी कोई अधिकारी या नेता नहीं थे | वे कोई उद्योगपति या व्यापारी भी नहीं थे कि उनके पास किसी को भौतिक रूप से लाभ पहुंचाने का कोई संसाधन उपलब्द्ध हो | वे बस आपको कुछ सिखा सकते थे | भाषा और बोली को बरतने का हुनर दे सकते थे | जीवन और समाज को समझने में मदद कर सकते थे | और वही वे करते भी थे | और इसीलिए केदार जी को उनके गाँव-जवार के लोग जानते थे, उनसे प्यार करते थे, उनका सानिध्य चाहते थे | और यह सब इसलिये था कि केदार जी उस जुड़ाव को न सिर्फ ‘रिसीव’ करते थे, वरन बदले में उससे कई गुना अपने गाँव-जवार में लौटाते भी रहे |

मुझे याद है कि दो वर्ष पहले एक बार जब हम उनके गाँव के लिए निकले थे, तो फोन पर उन्होंने जनसत्ता अखबार माँगा था | पिछले दस दिन का जनसत्ता समाचार-पत्र हम साथ ले गये थे | उन्हें लगा कि जैसे हमने कोई बड़ा उपहार दिया हो | दुखी मन से उन्होंने कहा था कि हिंदी के समाचार पत्रों का यह पतन बेहद चिंताजनक है | देखते हैं कि ‘जनसत्ता’ कब तक टिका रहता है | दुर्भाग्य देखिये कि इन दो वर्षों में ही जनसत्ता ने अपने आपको दैनिक जागरण के रास्ते पर धकेल दिया |

हमारी जब भी मुलाक़ात होती, दुनिया जहान की बातें होती | जाहिर है कविता की भी | उनके पिटारे में मौजूद किस्सों को देखकर लगता था कि उन्हें कथा लेखन भी करना चाहिए था | हम उनसे जोर देकर आग्रह करते थे कि अब उन्हें अपनी जीवन यात्रा को मुड़कर जरुर देखना चाहिए | आखिर हम पाठकों का भी कुछ हक़ बनता है | हम केदारनाथ सिंह की कविता से तो समृद्ध हैं, लेकिन हमारी इस ईच्छा का भी अब सम्मान होना ही चाहिए कि उस केदारनाथ सिंह के बनने की प्रक्रिया को समझें और जानें |

‘चकिया’ गाँव भी उसी तरह से गझिन और गुथा हुआ था, जिस तरह से कि आज हमारे समाज की मानसिकता | उसमें भी उतनी ही कम जगह बची थी, जितनी कि हमारे मन में | इसलिए हमारे लिए यह आश्चर्य का विषय रहता था कि तमाम भौतिक सुख-सुविधाओं को छोड़कर कोई दिल्लीवासी इस वंचित इलाके का साथ कैसे चुनता है | जहाँ आने वाली एक बड़ी आंधी पूरे क्षेत्र की बिजली व्यवस्था को एक महीने के लिए ध्वस्त कर देती हो, जहाँ एक बड़ी बारिश में एक सप्ताह के लिए आना-जाना दूभर हो जाता हो, वहां कौन सी प्रेरणा है जो वे बार-बार लौटते थे | उस दिल्ली को छोड़कर, जिसमें सारी सुख-सुविधाएँ, जिसमें सारा ग्लेयर और ग्लैमर मौजूद था |

हम उन्हें बार-बार कुरेदते थे कि आपको इन कठिन परिस्थितियों में रहते हुए अजीब नहीं लगता | वे मुस्कुराते हुए कहते कि यदि ‘चकिया’ नहीं होती, तो ‘केदार’ भी नहीं होता | “जानते हैं ..... हम कवियों का एक दुःख यह भी होता है कि हमारी प्रत्येक बात में लक्षणा और व्यंजना ही तलाशी जाने लगती है | लेकिन मैं इस बात को पूरी अविधा में कहता चाहता हूँ कि मेरे लिए ‘चकिया’ से बेहतर जगह इस दुनिया में कोई नहीं है | ‘चकिया’ के बिना मैं एक कविता क्या, एक पंक्ति नहीं लिख पाउँगा | मैं यहाँ बार-बार सीखने आता हूँ कि शब्दों को कैसे बरता जाय | उन्हें वाक्यों में कैसे पिरोया जाय | और कैसे उनसे कविता जैसी विधा को निभाया जाय | मैं नहीं जानता कि मैं इसमें कितना सफल हो पाया हूँ और कितना नहीं | लेकिन मैं इतना जरुर जानता हूँ कि मैं उस कविता को अभी नहीं लिख पाया हूँ, जो यहाँ के आम लोग अपने जीवन में प्रतिदिन बोलते हैं, प्रतिदिन गाते हैं |

तीन-चार घंटे बाद अब हम लोग चलने लगते तो वे हमें एक बार फिर बिठा लेते | कहने लगते, दिल्ली में कभी इस तरह से बैठकर कोई बात नहीं करता | और कोई क्या, मैं ही कहाँ कर पाता हूँ | कुछ समय बाद मुझे पटना आना है | उम्मीद करता हूँ कि ‘गाँव’ भी जरुर आऊंगा | और फिर आप लोगों से जरुर मुलाक़ात होगी | वे हमेशा हमें बाहर छोड़ने के लिए आते | इस आश्वासन के साथ कि अगली बार जल्दी ही फिर उनसे मुलाक़ात होगी |

सच ..... कविता के आठ-दस संग्रहों के होने से ही कोई केदारनाथ सिंह नहीं बनता | न ही कुछ ‘गँवई’ शब्दों के सहारे वह जादुई देशज ‘बिम्ब-विधान’ पा सकता है | उसके पीछे एक लम्बी जीवन यात्रा और संघर्ष की कहानी होती है, जो सिर्फ और सिर्फ जीकर, भोगकर और सहनकर ही सीखी जा सकती है | जहाँ कविता और जीवन में उतनी ही कम फांक है, जितनी कि एक आदमी के तौर पर होनी चाहिए | उतनी अधिक नहीं, जितनी इस समय आमतौर पर पायी जाती है |

आज केदारनाथ सिंह हमारे बीच नहीं हैं | उनका गाँव चकिया आज उनसे रिक्त हो गया | और रिक्त हो गया हिंदी कविता का एक बड़ा परिदृश्य, जिसने देश और दुनिया की कविता को समृद्ध किया था |
वे ठीक ही कहते थे कि “जाना हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है |”

अलविदा हमारे प्रिय कवि ....

अलविदा केदार जी .....



प्रस्तुतकर्ता

रामजी तिवारी
बलिया, उत्तर-प्रदेश
मो.न. 09450546312

शुक्रवार, 5 जनवरी 2018

कश्मीरनामा - इतिहास और समकाल



लेखक अशोक कुमार पाण्डेय की कश्मीर पर लिखी हुई बेहद महत्वपूर्ण किताब ‘कश्मीरनामा’ (इतिहास और समकाल) राजपाल एंड संस प्रकाशन से इसी पुस्तक मेले में आ रही है | इसका आमुख लिखा है सुप्रसिद्ध आलोचक और विचारक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने | आप पाठकों के लिए सिताब दियारा ब्लॉग पर वह आमुख प्रस्तुत है .....                             

                              आमुख ....
              
                   कश्मीरनामा (इतिहास और समकाल)

     
कहते हैं कि कश्मीर का सौंदर्य देख, जहाँगीर के मुँह से निकला था—“धरती पर स्वर्ग यदि कहीं है, तो यहीं है, यहीं है, यहीं है” ( अगर फिरदौस बर रु ए जमीं अस्त, हमीं अस्तो हमीं अस्तो हमीं अस्त.)
     
आज धरती के इस स्वर्ग में अविश्वासहिंसा और घृणा का नर्क फैला हुआ है।
     
अशोक पांडे की यह पुस्तक इस नर्क के फैलने की कथा विस्तार से कहती है। यह कथा नीलमतपुराणजैसे पौराणिक संदर्भों और राजतंरगिणीजैसे पारंपरिक इतिहास-ग्रंथों से आरंभ हो कर नवीनतम शोध और विवादों तक आती है। कथा का थोड़ा विस्तृत हो जाना लाजिमी था, लेकिन कश्मीर के समकाल की सही समझ के लिए वहाँ के इतिहास की जानकारी और समझ अनिवार्य है। कश्मीर के इतिहास, भूगोल और समकाल की कथा सुनना जरूरी है ताकि हम कश्मीर को सिर्फ समस्यानहीं बल्कि एक ऐसी जगह के रूप में पहचान पाएँ जहाँ हमारे जैसे ही नागरिक रहते हैंजिनका जीवन-मरण उस जगह के  विशिष्ट इतिहास और भूगोल से प्रभावित होता है।
       
कश्मीर-समस्याका एक कारण भूगोल है तो दूसरा इतिहासमुसलिम बहुल आबादी और भारत और पाकिस्तान दोनों से मिलती सीमाएँ। फैसला हर रियासत की तरह महाराजा को ही लेना था और उनकी मुख्य चिंता अपनी हुकूमत बनाए रखने की थी, जो कि व्यावहारिक रूप से संभव नहीं था। इसीलिए उन्होंने भारत और पाकिस्तान दोनों से सौदेबाजी की कोशिश की, और इसी दुचित्तेपन के कारण समस्या”  के वर्तमान रूप की शुरुआत हुई।
     
आज, असल समस्या है अजनबियत और पराएपन का बोध। इस बोध को दूर किये बिना उस असंतोष का कोई समाधान संभव नहीं जो बीच-बीच में उग्र रूप लेता रहता है। इसी के साथ, यह बात भी उतनी ही सच है कि कश्मीर को विश्वविजयी इसलाम” ( पैन इसलामिज्म) के आख्यान में स्थापित करने की कोशिशें लगातार चलती रही हैं। अशोक याद दिलाते हैं कि शेख अब्दुल्ला के 1931-32 के लोकतांत्रिक और व्यावहारिक रूप से सेकुलर आंदोलन के जमाने से ही पैन इसलाम और कट्टरपंथ के तत्व आंदोलन को भटकाने की कोशिश कर रहे थे। यह  ब्रिटिश राज के इशारे पर ही हो रहा था। इस विचारधारा के प्रभाव में आने वालों को कैसी आजादीमिली, यह पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में देखा जा सकता है। कहने की जरूरत नहीं कि इस आंदोलन को ही नहीं, सारी राजनैतिक प्रक्रिया को हिन्दू-मुसलमान में बदलने के काम में हिन्दू सांप्रदायिकता पीछे नहीं थी। स्वाभाविक ही था, कि हिन्दू और मुसलिम दोनों रंगत की सांप्रदायिक राजनीति  कश्मीर में भी वही कर रही थी, और कर रही है, जो बाकी सारे देश में। यह पुस्तक ऐसे अनेक प्रसंग रेखांकित करती है, बहुत सारे मिथकों और छद्म नायकों की वास्तविकता को सप्रमाण, तर्कसंगत ढंग से उजागर करती है।
     
ऐसा नहीं है कि पराएपन  का बोध केवल कश्मीरी मानस में है। कश्मीरियों को बाकी भारत के लोग कितना अपना समझते हैंउनके बारे में  किस तरह सोचते हैंएक सिरे पर वे लोग हैं जिनके लिए ना मानवाधिकारों का कोई मतलब है ना कानूनी प्रक्रियाओं का, वे हर तरह के दमन का समर्थन राष्ट्रवाद के नाम पर करते हैं। जिनकी समझ खीर देंगेचीर देंगेवाली वाणी में झलकती है। ये लोग भूल जाते हैं कि असंवाद का समाधान संवाद से ही हो सकता है, आक्रामकता से नहीं। दूसरी तरफ वे हैं जो बिना सोचे-समझे आत्मनिर्णय़ के अधिकार’  का समर्थन करते हैं। इन्हें इससे कोई मतलब नहीं कि आत्मनिर्णय में आत्मकौन होगा? कैसे निर्धारित होगा? उसका अन्यकौन होगा? इन सवालों की उपेक्षा करने का नतीजा यही होना है कि घोर कट्टरपंथी, प्रतिगामी तत्व राजसत्ता और समाजतंत्र पर हावी हो जाएँ। औरतें सदा के लिए दोयम दर्जे पर ठेल दी जाएँ, मेहनतकश तबकों के अधिकारों की बात  से लेकर  सिनेमा आदि  तक को कुफ्र करार दे दिया जाए।
       
कश्मीरनामाकी खूबी यह है कि सवाल सांप्रदायिकता का हो, या कश्मीर की सामाजिक संरचना और उसके ऐतिहासिक विकास का, इतिहास के मूल्यांकन का हो, या भविष्य की कल्पना का—-सरलीकरणों के बजाय किताब तथ्यों, प्रमाणों और उनसे प्राप्त होने वाले निष्कर्षों पर भरोसा करती है। सामाजिक-सांस्कृतिक पहचानों के प्रति संवेदनशील रहते हुए भी, अशोक उनके निर्माण की ऐतिहासिक प्रक्रिया और सामाजिक गतिकी के आर्थिक-भौतिक पहलू को कहीं भी  ओझल नहीं होने देते। वे सांस्कृतिक  अस्मिता के सवालों को वास्तविक आर्थिक-सामाजिक ढांचे के संदर्भ में तथा अखिल भारतीय ही नहीं व्यापार के अतंर्राष्ट्रीय संदर्भ में  भी रखते हैं।
     
बीसवीं  सदी के कश्मीर का राजनैतिक इतिहास शेख अब्दुल्ला और उनकी विरासत से गुँथा हुआ है। अशोक शेख अब्दुल्ला के राजनैतिक विकास-क्रम को सहानुभूति के साथ देखते हैं, लेकिन आलोचनात्मक आकलन करते हुए। वे इस बात को विडंबना कहते हैं कि  शेख अब्दुल्ला मुस्लिम और हिन्दू, दोनों तरह के कट्टरपंथियों के लिए हमेशा नफ़रत का सबब रहे ।
     
इसमे विडंबना क्या है? यह तो बिल्कुल स्वाभाविक बात है। जो भी व्यक्ति सांप्रदायिक राजनीति के बरक्स समावेशी और सेकुलर राजनीति करेगा, वह ऐसे लोगों की नफरत ही तो कमाएगा। हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात करने के लिए शेख़ अब्दुल्ला को मुस्लिम कट्टरपंथी बीसवीं सदी के चौथे-पाँचवें दशक में मुस्लिम विरोधी कह रहे थे तो नेहरू को हिन्दू विरोधी साबित करने के लिए हिन्दू कट्टरपंथ ने दुष्प्रचार की सारी हदें पार की हैं।
     
एक दुष्प्रचार यह भी है कि कश्मीर समस्या’  के लिए नेहरू ही जिम्मेवार हैं। अशोक ने कुछ जरूरी तथ्य याद दिलाए हैं, जो इस दुष्प्रचार का निवारण तो करते ही हैं, इस विडंबना का निराकरण भी करते हैं कि, “आज कश्मीर को लेकर नेहरू को बार-बार कटघरे में खड़ा किया जाता है और कहा जाता है कि अगर पटेल की चलती तो कश्मीर में कोई समस्या नहीं होती।
     
अशोक की उपलब्धि यह है कि वे कई स्रोतों में बिखरी पड़ी सूचनाओं और उनसे संबंधित वाद-विवाद को सामाजिक-ऐतिहासिक गतिकी के सुचिंतित तर्क और लोकतांत्रिक नागरिकता के नैरेटिव में रखने में सफल हुए हैं।
     
विवरण चाहे कश्मीर के इतिहास हो, चाहे समकाल कालेखक के चित्त में स्त्रियों की दशा ( अधिकांशत: दुर्दशा ही) के सवाल की सतत उपस्थिति आश्वस्तिदायक है।
     
कोई दो-ढाई साल पहले, अशोक ने कश्मीर पर किताब लिखने की इच्छा जताई थी। लिखे हुए के कुछ मसौदे मुझे पढ़वाए भी थे। मैं तभी से कश्मीरनामाका इंतजार करता रहा हूँ। यह आमुख लिखते समय मुझे जैसे संतोष और खुशी का अहसास हो रहा है, आप समझ ही सकते हैं। मेरी जानकारी में, यह हिन्दी में इस विषय पर इतने मुकम्मल ढंग से लिखी गयी पहली किताब है। आशा और विश्वास जताने की बात नहीं, मैं निश्चित रूप से जानता हूँ कि कश्मीरनामाका अध्येताओं और सामान्य पाठकों के बीच शानदार स्वागत होगा।


पुरुषोत्तम अग्रवाल

सुप्रसिद्ध आलोचक और विचारक





















बुधवार, 27 जुलाई 2016

पंखुरी सिन्हा की कवितायें




पंखुरी सिन्हा को आप पहले भी सिताब दियारा ब्लॉग पर पढ़ चुके हैं । इस बार उनकी कवितायें हमें 'पेड़ और पक्षियों' की दुनिया में ले जा रही हैं । एक ऐसी दुनिया, जो हमारी सहोदर तो है । जो बहुत कुछ जानी-पहचानी भी है । लेकिन इन सबसे अधिक रहस्यमयी और अनजानी भी है .... |

         
            तो आईये पढ़ते हैं सिताब दियारा ब्लॉग पर
                 पंखुरी सिन्हा की कवितायें


1...  पेड़ों से परिचय

पेड़ों से मेरी इस किस्म की पहचान
बहुत नयी है
कि अमुक पेड़ का पपीता पका अच्छा
अमुक का कच्चा
अमुक के फल में ज़्यादा स्वाद
जबकि दोनों अगल बगल हैं
अजब रहस्य है प्रकृति
बूझो तो जानें नहीं
बूझना ही असंभव
है ही नहीं कुछ बूझने को
खाद, पानी, मिटटी
हवा भी नहीं
ये पड़ोसी पेड़ों का अचम्भा
अजूबा
नया है मेरे लिए
और वो भी
पपीते के पेड़ों का
शहरी दो कट्ठे में
कस्बाई शहरों की तंग गलिओं के बगीचों में
नारियल, ताड़, खजूर पपीते की उंचाई मापते
फलों की पहचान
उन्हीं से परिचय
आम का विस्तार नहीं
दुर्लभ है
और जबकि शहर ही लीची का
लीची की छाँव नहीं
दुर्लभ है
आम, लीची का तो ये
कि आम, लीची के बिके बग़ीचे
शेष रह गए किस्से
और जब नया जुड़ रहा हो नाता
पपीते के चार पेड़ों से
तो कल्पना की दस्तक
कि किस किस्म के रहे होंगे
उनके रिश्ते
मुझसे एक ही पीढ़ी पहले वालों के
आम के अलग प्रकारों से नहीं
एक ही प्रकार के आम के दो पेड़ों से
चार, या आठ पेड़ों से
जिन नामों के अब पेड़ नहीं होते
लुप्त हैं, विलुप्त हैं
गायब हैं
सरे ज़मीन से
बहुत ढ़ेर सारी किस्मों के आम के पेड़
जो हाल हाल तक लोगों के अपने
और प्रिय पेड़ हुआ करते थे
ऐसे कि
इस नहीं
उस पेड़ का फल पसंद था उन्हें ................


....................................
...................................

2 ... चिड़ियों के लिए निमंत्रण पत्र

चिड़ियों को नहीं भेजने होते
कबूतरों के गुलाबी पैरों में बाँध कर निमंत्रण पत्र
केवल पेड़ लगा देने से वो चली आती हैं
वो सारी आत्मीयता लिए
जो प्राकृतिक है
और सहज
कोई राजनीति नहीं
उनकी बुलाहट की
तस्वीरों का सारा सौंदर्य लिए
वो चले आते हैं
विदेशी तस्वीरों जैसे हमिंग बर्ड
चमकीले रंगों वाले
अजब रंगों वाले
जिनका पराग का पान करते
हवा में उड़ना
होता है जादू के खेल का देखना
पंजे उठाये
या उठाये अपने पैर
डैने फड़फड़ाते
नहीं पसारते
बिन पसरा
उड़ने का
जादू का खेल
अकेले
बस में करती
चिड़िया जादूगरनी
चुराती मेरा शहर
मेरा बगीचा
मेरा दिन
आँखें उसकी मोहताज
लगाकर पेड़
इंतज़ार उसका
फूलों का भी
दुहरा इंतज़ार
अकेला इंतज़ार
आएगी वह
जो कभी जोड़े में नहीं आती
गर्वीली, हठीली चिड़िया
आते हैं सतभइये
जो कभी अकेले नहीं आते
कभी अकेले नहीं आता
घुघ्घू पक्षी का झुण्ड
आता है सात की संख्या में
सब जानते हैं.

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      3 ... बातों का पहुँचना

कुछ बातों के पहुँचने की भी बातें थीं
डाक के पहुँचने की तरह
बल्कि सेना के भी पहुँचने की तरह
पहाड़ के ऊपर
या पहाड़ के नीचे
जब वह पैदल पहुँचती है
घाटी की पहचान करती
वाकिफ होती
बातें करती
आवो हवा से
ताकि वह अजनबी लगे
वह सारी प्रक्रिया जिसे अकक्लीमेटाईज़ेशन
कहते हैं
रूपांतरित करती बातों को
अनूदित से ज़्यादा आसान बनाती
परिवेश में ढ़ालती
आवो हवा में
स्थानीय विश्वासों में
बातों की स्थानीयता बताती
उन्हें कुछ ग्राह्य बनाती
ताकि एक दम फिरंगी लगें
डाक से आयीं विकास गाथाएं
और उन्हें कार्यान्वित करने की  लिपि
कुछ अपठनीय आदेश सी
और भी विकास के किस्से
औरतों की बगावत गाथाएं भी ....................
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4 ...... एक समूचा वार्तालाप

मैं बाहर निकली तो खुदा खैर करे
नींबू के पेड़ पर एक चिड़िया थी
चिड़िया को उसका देखा जाना
मालूम हुआ
फ़ौरन मालूम
वो चहकी, चिल्लाई
अपनी भाषा में कुनमुनाई
हवा में गोल, गोल उड़ आई
वृत्त बनाती छोटे, बड़े
डैने फैलाये, कम ज़्यादा
हवा में अद्भुत आकार बनाती
अलग, अलग शाखों पर उड़ आई
बस कुछ दूर जाकर मेरे पास
क्या, क्या नहीं बोली चिड़िया वह
उसकी आवाज़ चढ़ती, उतरती रही
जैसे नदी का वेग
या झरने का गीत
या पठारों की चढ़ाई और ढलान
उसके स्वर मेरे पास कर
मुझमें समाते रहे
सदियों के राज़ बता गयी वह मुझे
और पूरा हुआ एक समूचा वार्तालाप
उसकी खुली हुई चोंच में
मुझे मिल गयी ज़िन्दगी की सारी आतुरता
और मिठास
और दब गया पड़ोसियों का रोज़ चलने वाला
राजनैतिक विमर्श...................
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5 ... कुशल क्षेम

कैसा रहा ये साल पूछो
क्या क्या रहे बवाल पूछो
किसके क्या थे सवाल पूछो
अब कैसा है हाल पूछो……………………



परिचय....


पंखुरी सिन्हा

चर्चित युवा कवयित्री
आजकल दिल्ली  में रहती हैं